नागपुर: कामठी नगर परिषद चुनाव से जुड़े हाई-प्रोफाइल विवाद में अब कानूनी लड़ाई से ज्यादा रणनीतिक देरी चर्चा का विषय बनती जा रही है। जिला न्यायाधीश-13 एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नागपुर की अदालत में आज हुई सुनवाई में प्रतिवादी पक्ष ने एक बार फिर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांग लिया—और अदालत ने उसे मंजूरी भी दे दी।
याचिकाकर्ता तहरीम कमाल मोहम्मद अरशद कमाल, जो प्रभाग क्रमांक 1 B से उम्मीदवार थीं, की ओर से पूरा पक्ष तैयार रहते हुए पेश किया गया। वहीं, प्रतिवादी क्रमांक 1 (रिटर्निंग ऑफिसर) की ओर से Exh. 28 के जरिए जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। नतीजा—मामला अब भी “Reply/Say” के शुरुआती चरण में ही अटका हुआ है।
🔥 सवालों के घेरे में ‘टैक्टिक्स’
कानूनी जानकार इसे सीधे तौर पर “delaying tactics” बता रहे हैं—ऐसी रणनीति जिसमें बार-बार समय मांगकर सुनवाई को लंबा खींचा जाता है, ताकि अंतिम निर्णय टलता रहे।
एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह स्पष्ट रूप से न्यायिक प्रक्रिया को लंबा खींचने की कोशिश है। जब मामला चुनाव से जुड़ा हो, तब हर दिन की देरी का सीधा असर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर पड़ता है। अदालत को अब ‘last opportunity’ या ‘cost’ जैसे सख्त कदम उठाने चाहिए।”
⚖️ 90 दिन की सीमा—अब और कितना इंतजार?
कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि जवाब दाखिल करने के लिए अनंत समय नहीं दिया जा सकता।
सिविल प्रक्रिया के सिद्धांतों के अनुसार, सामान्यतः लिखित जवाब (Written Statement) दाखिल करने की अधिकतम समयसीमा 90 दिन मानी जाती है (विशेष परिस्थितियों को छोड़कर)।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने कड़े शब्दों में कहा:
“90 दिन की सीमा कोई औपचारिकता नहीं है, यह न्यायिक अनुशासन है। यदि इसके बाद भी जवाब नहीं आता, तो अदालत को सख्त रुख अपनाते हुए ‘reply close’ करना चाहिए। बार-बार समय देना न्याय प्रक्रिया के साथ समझौता है।”
🔥 ‘Delaying tactics’ या प्रक्रिया का दुरुपयोग?
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार समय मांगना एक सोची-समझी prolonging strategy हो सकती है—
👉 ताकि सुनवाई लंबी चले
👉 फैसला टलता रहे
👉 और मामला प्रभावहीन हो जाए
ऐसे मामलों में अदालतों द्वारा “last opportunity” या cost impose करना जरूरी माना जाता है, ताकि प्रक्रिया का दुरुपयोग रोका जा सके।
📅 अब अगली तारीख निर्णायक?
मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च 2026 को तय है।
अब सभी की नजर इस पर है:
👉 क्या प्रतिवादी जवाब दाखिल करेगा?
👉 या अदालत 90 दिन की सीमा को ध्यान में रखते हुए सख्त कदम उठाएगी?
स्पष्ट संकेत यही हैं—अब अदालत की सख्ती ही तय करेगी कि यह मामला आगे बढ़ेगा या तारीखों के जाल में उलझा रहेगा।


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